गुलज़ारियत


गुलज़ार...जैसे स्याही इनके खून में बहती है...और हर सांस के साथ अक्षर सीने में भरते है..उतने ही हैं...जितने मेरे या आपके पास हैं...लेकिन उन्ही अक्षरों का इतना सुन्दर एक दुसरे से रिश्ता बनाते हैं कि उन अक्षरों को जैसे एक नयी ज़िन्दगी देते है...मानी बदल जाते हैं...गुलज़ार का लिखा हर अक्षर जैसे  सजदे में बैठा मासूम कोई नमाज़ी. न जाने किस ज़िन्दगी से गुजरा है ये शख्स, न जाने खुदा ने किस तरह के दिल से बख्शा है इन्हें कि जब भी लिखते हैं...या तो क़लम को रुला देते हैं या कागज़ को, हम और आप तो क्या हैं? क्यों ऐसा लिख देते हैं कि इन्हें सुनने या पढने के बाद किसी और को क़लम उठाने में भी शर्म आये...यूँ लगता है कि अब कुछ लिखने को बाकी ही कहाँ है? वही परबत है, वही पहाड़ है, वही दिल, दर्द, धडकन, वही मैं आप हम, लेकिन कैसे बिछाते हैं ये शब्दों की बिसाते कि हर बाज़ी नयी लगती है, हर शब्द जैसे अभी अभी जन्मा हो...
      किल दिल के गानों के लिए क्या गुलज़ार ने कई रातें ख़राब की होंगी...लगता तो नहीं...वो तो चलते फिरते यूँही...चाय की चुस्कियों में या एक शाम लालटेन की रौशनी में लिख दिए होंगे..क्योंकि गुलज़ार के दिल में किस एहसास की किताब नहीं?...बस किसी भी एक एहसास के कुछ पन्ने पलटे और लिख दिया एक नगमा, जो लोगों के कानों में जाएगा और चीर देगा दिल...
पहला गाना...बावरा...जो उन्हीं की आवाज़ से शुरू होता है..”कोई अटका हुआ है पल शायद...वक़्त में पड गया है बल शायद” अरे इतनी बड़ी बात कोई इतनी आसानी से केसे कह सकता है?...प्लीज...जीने दो...अरे सच कहता हूँ जीने दो...आपको सुन सुन के तो लगता है...”ना भूतो न भविष्यति” एक गाने में एक जुनून का समंदर है, दर्द की इंतन्हा है...शंकर महादेवन की आवाज़ में जब आप ये लाइन सुनेंगे “दिल वाली नौकरी ने मारा” तो लगेगा कि बेहद आसां शब्दों में कायनात का दर्द समेट के कागज़ पे उतारा और हमे निशब्द छोड़ दिया...
दूसरा “बोल बेलिया” सोच रहा हूँ इस के लिए क्या लिखूं ? अजीब सी कशिश लेके जन्मा है ये गाना..जब किसी ने क़यामत की रात तक किसी अपने का इंतज़ार किया होगा तो उस एहसास को निचोड़ के जो सालों तक स्याही रखी गई होगी, उसी स्याही से ये गाना लिखा...उन अँधेरे रास्तों का पता गुलज़ार को भी पता है...जब किसी की राह उन्होंने तकी होगी...आँखों में कितने ही बार मरें होंगे और जियें होंगे...

उम्र भर गुलज़ार के सजदे में रहूँ तो भी कम हो...यकीं मानिए जो दिल लेके ये लिखना  शुरू किया था उनका 10% भी नहीं लिख पाया...

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