ज़रूरत का नाम बना दिया मेरे नाम को, अजीब है यार दस्तूर भी दोस्ती के
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गुलज़ारियत
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गुलज़ार...जैसे स्याही इनके खून में बहती है...और हर सांस के साथ अक्षर सीने में भरते है..उतने ही हैं...जितने मेरे या आपके पास हैं...लेकिन उन्ही अक्षरों का इतना सुन्दर एक दुसरे से रिश्ता बनाते हैं कि उन अक्षरों को जैसे एक नयी ज़िन्दगी देते है...मानी बदल जाते हैं...गुलज़ार का लिखा हर अक्षर जैसे सजदे में बैठा मासूम कोई नमाज़ी. न जाने किस ज़िन्दगी से गुजरा है ये शख्स, न जाने खुदा ने किस तरह के दिल से बख्शा है इन्हें कि जब भी लिखते हैं...या तो क़लम को रुला देते हैं या कागज़ को, हम और आप तो क्या हैं? क्यों ऐसा लिख देते हैं कि इन्हें सुनने या पढने के बाद किसी और को क़लम उठाने में भी शर्म आये...यूँ लगता है कि अब कुछ लिखने को बाकी ही कहाँ है? वही परबत है, वही पहाड़ है, वही दिल, दर्द, धडकन, वही मैं आप हम, लेकिन कैसे बिछाते हैं ये शब्दों की बिसाते कि हर बाज़ी नयी लगती है, हर शब्द जैसे अभी अभी जन्मा हो... किल दिल के गानों के लिए क्या गुलज़ार ने कई रातें ख़राब की होंगी...लगता तो नहीं...वो तो चलते फिरते यूँही...चाय की चुस्कियों में या एक शाम लालटेन की रौशनी में लिख दिए हो...