मेरी पसंद की एक किताब मेरी मेज़ पे कई दिनों से अधूरी पड़ी है. 

 मेरी पसंद की एक किताब मेरी मेज़ पे कई दिनों से अधूरी पड़ी है.
किताब की पन्नो की कुछ दोस्ती हो गई है मेरी उँगलियों से
जब भी उठाता  हूँ, लिपट जाते है दो -चार पन्ने
पास लेके सोता हूँ सिरहाने रख के
दूर नहीं जाने देता, न किसी और के हाथो में
हर पन्ना अपना सा लगता है
चेहरा देखता हूँ उसके पन्नो में अपना
वो कई बार हंसाती है मुझको, जब आँख भर आती है.
हवा में अपने पन्ने नचाती है जेसे छोटी सी बच्ची बेताला नाचती है किसी गाने पे
कई रातें उसको सीने से लगा के सोया हूँ
वो मेरी उंगलिया नहीं छोडती, जब बीच में रख के, बंद करता हूँ कुछ सोचता हूँ
पर....वो लगती क्या है मेरी ? आम सी किताब, बाज़ार से लाया था
पर पूरी नहीं पढता उसको, बाकी है अभी २४ पन्ने
पूरी पढ़ ली तो बंद करके अलमारी में रख दूंगा इसीलिए
मेरी पसंद की एक किताब मेरी मेज़ पे अधूरी पड़ी है 

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